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'भारत ने हमें बंधकों की तरह नाव में बिठा कर समंदर में फेंक दिया'- रोहिंग्या शरणार्थियों की आपबीती

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BBC म्यांमार वापस भेजे गए शरणार्थियों में शामिल सैयद नूर (बीच में). उन्होंने बीबीसी से वीडियो कॉल के ज़रिये बात की.

नुरुल अमीन ने आख़िरी बार अपने भाई से 9 मई 2025 को बात की थी. फ़ोन पर हुई बात संक्षिप्त थी लेकिन ख़बर बेहद बुरी थी.

उन्हें पता चला कि उनके भाई कैरुल और चार अन्य रिश्तेदार उन 40 रोहिंग्या शरणार्थियों में शामिल हैं जिन्हें भारत सरकार ने कथित तौर पर म्यांमार भेज दिया है.

वो देश जहां से वे कई साल पहले डर के मारे भागे थे.

म्यांमार इस वक़्त एक निर्मम गृहयुद्ध में फंसा है. 2021 में एक तख़्तापलट के बाद सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद सेना जातीय मिलीशिया और रेजिस्टेंस फोर्सेज़ से लड़ रही है.

अमीन शायद ही फिर कभी अपने परिवार को देख पाएंगे.

24 वर्षीय अमीन ने दिल्ली में बीबीसी से कहा, ''मैं उस यातना को समझ भी नहीं पा रहा था जिसका सामना मेरे माता-पिता और बाक़ी लोग कर रहे होंगे."

दिल्ली से हटाए जाने के तीन महीने बाद बीबीसी म्यांमार में इन शरणार्थियों से संपर्क करने में सफल रहा.

ज़्यादातर लोग बा थू आर्मी के साथ रह रहे हैं. यह एक प्रतिरोध समूह है जो देश के दक्षिण-पश्चिम में सेना से लड़ रहा है.

सैयद नूर ने बताया, "हम म्यांमार में सुरक्षित महसूस नहीं करते. यह जगह पूरी तरह युद्ध क्षेत्र है. नूर ने एक वीडियो कॉल पर ये बात कही थी. ये कॉल बा थू आर्मी के एक सदस्य के फोन से की गई थी.''

उन्होंने लकड़ी की एक झोपड़ी से बात की, जहां उनके साथ छह और शरणार्थी मौजूद थे.

बीबीसी ने शरणार्थियों की गवाही, दिल्ली में रिश्तेदारों के बयान और जांच कर रहे विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर पता किया कि उनके साथ क्या हुआ था.

बीबीसी ने ये आरोप भारत सरकार और भारतीय नौसेना के सामने रखे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

'लाइफ़ जैकेट पहनाकर समंदर में फेंक दिया गया' image Noorul Amin नुरुल अमीन के भाई कैरुल (बिल्कुल दाएं) अपने माता-पिता और भाई के साथ. कहा जा रहा है कि इन लोगों को म्यांमार भेज दिया गया है. भारत में कितने रोहिंग्या शरणार्थी? image Getty Images दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में रोहिंग्या बदहाल जीवन जी रहे हैं

बीबीसी को पता चला कि उन्हें दिल्ली से बंगाल की खाड़ी के एक द्वीप पर ले जाया गया.

फिर एक नौसैनिक जहाज में बिठाया गया. आख़िर में उन्हें लाइफ़ जैकेट पहनाकर अंडमान सागर में उतार दिया गया.

इसके बाद ये लोग तट पर पहुंचे. और अब म्यांमार में एक अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं.

ये वही देश है जिसे ज़्यादातर-मुस्लिम रोहिंग्या समुदाय ने हाल के वर्षों में उत्पीड़न से बचने के बड़ी तादाद में छोड़ा था.

इस समूह में शामिल एक शख़्स जॉन ने फ़ोन पर बताया, ''उन्होंने हमारे हाथ बांध दिए, हमारे चेहरे ढक दिए और हमें क़ैदियों की तरह (जहाज़ पर) ले आए. फिर हमें समुद्र में फेंक दिया.''

समूह के एक व्यक्ति जॉन ने ज़मीन पर पहुंचने के तुरंत बाद अपने भाई को फ़ोन पर ये बात बताई.

अमीन आरोप लगाते हैं, "कोई इंसानों को यूं ही समुद्र में कैसे फेंक सकता है? दुनिया में इंसानियत बाक़ी है लेकिन मैंने भारत सरकार में कोई इंसानियत नहीं देखी."

संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार में मानवाधिकार स्थिति पर नज़र रखने वाले विशेष अधिकारी थॉमस एंड्रयूज़ का कहना है कि इन आरोपों को साबित करने वाले 'अहम सबूत' मौजूद हैं, .

इन सबूतों को उन्होंने जेनेवा में भारत के मिशन प्रमुख के सामने पेश किया है लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला.

बीबीसी ने भी भारत के विदेश मंत्रालय से कई बार संपर्क किया लेकिन इस स्टोरी के छपने तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.

इस मुद्दे पर अभियान चलाने वालों ने कई बार कहा है कि भारत में रोहिंग्या की स्थिति बेहद मुश्किल है.

भारत रोहिंग्या को शरणार्थी नहीं मानता. उन्हें वो अवैध प्रवासी समझता है.

भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों की एक बड़ी आबादी है. हालांकि सबसे ज़्यादा यानी दस लाख से ज़्यादा लोग बांग्लादेश में रहते हैं.

ज़्यादातर लोगों ने 2017 में सेना की घातक कार्रवाई के बाद म्यांमार छोड़ा था.

पीढ़ियों से वहां रहने के बावजूद म्यांमार में रोहिंग्या को नागरिक नहीं माना जाता.

भारत में यूएनसीएचआर यानी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी में 23,800 रजिस्टर्ड रोहिंग्या शरणार्थी हैं.

लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच का अनुमान है कि असल संख्या चालीस हजार से अधिक है.

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शरणार्थियों से मारपीट के आरोप image Getty Images म्यांमार से हजारों रोहिंग्या भाग चुके हैं. उन्हें विस्थापन झेलना पड़ रहा है. (पुरानी तस्वीर)

जो लोग म्यांमार भेजे गए हैं उन्होंने बताया कि छह मई को दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले यूएनसीएचआर कार्डधारक चालीस रोहिंग्या शरणार्थियों को स्थानीय थानों में बुलाया गया.

इन लोगों को कहा गया कि बायोमैट्रिक डेटा इकट्ठा करना है.

यह भारत सरकार की सालाना प्रक्रिया है जिसमें रोहिंग्या शरणार्थियों की फ़ोटो और फ़िंगरप्रिंट लिए जाते हैं.

फिर कई घंटे बाद उन्हें शहर के इंद्रलोक डिटेंशन सेंटर ले जाया गया.

अमीन कहते हैं कि उसी वक़्त उनके भाई ने फ़ोन कर बताया कि उन्हें म्यांमार ले जाया जा रहा है. उन्होंने उनसे कहा कि वक़ील से संपर्क करें और यूएनसीएचार को ख़बर करें.''

7 मई को शरणार्थियों ने बताया कि उन्हें दिल्ली के पूरब में हिंडन एयरपोर्ट ले जाया गया, जहां उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीपों के लिए विमान पकड़ा.

नूर ने वीडियो कॉल पर बताया "प्लेन से उतरने के बाद हमने देखा कि दो बसें हमें लेने आई थीं, बसों पर "भारतीय नौसेना" लिखा हुआ था. जैसे ही हम बस पर चढ़े, उन्होंने हमारे हाथ प्लास्टिक से बांध दिए और चेहरे पर काला मलमल का कपड़ा बांध दिया,"

वो कहते हैं, ''हालांकि बसों पर मौजूद लोगों ने अपनी पहचान नहीं बताई. वे फ़ौजी वर्दी पहने हुए थे और हिंदी बोल रहे थे.''

नूर के मुताबिक़ थोड़ी ही देर में समूह को बंगाल की खाड़ी में एक नौसैनिक जहाज़ पर चढ़ा दिया गया. इसका पता तब चला जब उनके हाथ खोले गए और चेहरे से कपड़ा हटाया गया.

वो इस जहाज़ को एक बड़ा युद्धपोत बता रहे थे, जिसमें दो मंज़िलें थीं और लंबाई कम से कम 150 मीटर.

नूर के साथ कॉल पर मौजूद मोहम्मद सज्जाद ने बताया, "जहाज़ पर मौजूद कई लोग टी-शर्ट, काली पैंट और काले फ़ौजी बूट पहने हुए थे. कुछ लोग भूरे रंग के कपड़े भी पहने हुए थे."

नूर बताते हैं कि उनका समूह 14 घंटे तक उस नौसैनिक जहाज़ पर रहा.

उन्हें नियमित तौर पर खाना दिया गया. ये पारंपरिक भारतीय खाना था, जिसमें दाल, चावल और पनीर था.

कुछ लोगों का कहना है कि उनके साथ हिंसा हुई और उन्हें अपमानित किया गया.

नूर ने कहा, "हमारे साथ बहुत बुरा सलूक किया गया. कुछ लोगों को बुरी तरह पीटा गया. उन्हें कई बार थप्पड़ मारे गए."

वीडियो कॉल पर फ़याज़ उल्लाह ने अपनी दाईं कलाई के निशान दिखाए. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें बार-बार पीटा गया, पीठ और चेहरे पर थप्पड़ मारे गए और बांस की छड़ी से चुभोया गया.

फ़याज़ उल्लाह ने कहा, "उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम भारत में ग़ैरक़ानूनी तौर पर क्यों रह रहे थे?"

रोहिंग्या मूल रूप से मुस्लिम समुदाय है लेकिन मई में ज़बरन लौटाए गए चालीस लोगों में से 15 ईसाई हैं.

नूर ने कहा, "हमें ले जाने वाले लोग कहते थे, 'तुम हिंदू क्यों नहीं बन गए? तुमने इस्लाम से ईसाई धर्म क्यों अपना लिया?'. उन्होंने हमें पैंट तक उतारने को कहा ताकि देख सकें कि हम ख़तना किये हुए हैं या नहीं."

एक और शरणार्थी, इमान हुसैन ने कहा कि फ़ौजी कर्मचारियों ने उन पर पहलगाम नरसंहार में शामिल होने का आरोप लगाया.

22 अप्रैल के कश्मीर के पहलगाम पर हुए हमले में चरमपंथियों ने 26 लोगों को मार दिया था. मारे गए लोगों में ज्यादातर हिंदू पर्यटक थे.

भारत सरकार बार-बार कहती रही है कि ये हमले पाकिस्तानी नागरिकों ने किए. हालांकि पाकिस्तान ने इससे इनकार किया है.

ऐसा कोई सबूत नहीं है कि रोहिंग्या का इस हमले से कोई संबंध था.

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यूएन ने कहा, शरणार्थियों को ख़तरे में डाल दिया image Getty Images म्यांमार में 2021 में हुए एक सैनिक तख़्तापलट के बाद से गृहयुद्ध चल रहा है (फ़ाइल फोटो)

8 मई को स्थानीय समय के मुताबिक़ शाम सात बजे शरणार्थियों को कहा गया कि वे नौसैनिक जहाज़ के किनारे पर लगी सीढ़ी से नीचे उतरें. नीचे उन्होंने चार छोटी रबड़ की नावें देखीं.

शरणार्थियों को दो नावों में बिठाया गया. इनमें 20-20 लोगों को बिठाया गया. बाकी दो नावों में दर्जन भर कर्मचारी थे.

जो आगे-आगे चले रहे थे. शरणार्थी सात घंटे तक सफर करते रहे. इस दौरान उनके हाथ बंधे हुए थे.

नूर ने कहा, "एक नाव किनारे पहुंची और पेड़ से लंबी रस्सी बांधी गई. फिर रस्सी हमारी नावों तक लाई गई, हमें लाइफ़ जैकेट दिए गए. हाथ खोले गए. और हमें पानी में कूदने को कहा गया. हमने रस्सी पकड़ी और 100 मीटर से ज़्यादा तैर कर किनारे पहुँचे,"

नूर ने कहा, ''उन्होंने कहा, तुम लोग इंडोनेशिया पहुंच गए हो इसके बाद वे लोग हमें छोड़कर चले गए.''

image BBC

बीबीसी ने ये आरोप भारत सरकार और भारतीय नौसेना के सामने रखे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

9 मई की सुबह-सुबह इस समूह को स्थानीय मछुआरे मिले जिन्होंने बताया कि वे म्यांमार में हैं.

उन्होंने शरणार्थियों को अपने फ़ोन इस्तेमाल करने दिए ताकि वे भारत में अपने परिवार को कॉल कर सकें.

तीन महीने से ज़्यादा हो गया है, बा थू आर्मी म्यांमार के तनिनथारी क्षेत्र में फंसे शरणार्थियों को खाना और ठिकाना देकर मदद कर रही है.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि जब भारतीय अधिकारियों ने रोहिंग्या शरणार्थियों को अंडमान सागर में धकेला तो उनकी ज़िंदगी "बेहद ख़तरे में डाल दी गई."

एंड्रयूज़ ने कहा, "मैंने ख़ुद इस बेहद परेशान करने वाले मामले पर शोध किया है.''

उन्होंने माना कि वे बहुत सारी जानकारी साझा नहीं कर सकते.

उन्होंने कहा, "मैंने चश्मदीदों से बात की है और इन रिपोर्टों की पुष्टि की है. ऐसी घटनाएं सच हैं.''

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सुप्रीम कोर्ट फै़सला करेगा, रोहिंग्या शरणार्थी या अवैध प्रवासी image BBC यूएनसीएचआर का कार्ड दिखाते नुरुल इस्लाम. भारत में रह रहे नुरुल अमीन को डर है कि उन्हें कभी भी म्यांमार भेजा जा सकता है.

17 मई को, अमीन और हटाए गए शरणार्थियों के एक और रिश्तेदार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्हें दिल्ली वापस लाने, ऐसे निर्वासन पर तुरंत रोकने और सभी 40 लोगों को मुआवज़ा देने की मांग की गई.

सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंज़ाल्वेस कहते हैं, "इसने पूरे देश को रोहिंग्या निर्वासन की भयावहता से रूबरू करा दिया है."

गोंज़ाल्वेस सुप्रीम कोर्ट में इन शरणार्थियों का केस लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "किसी को युद्ध क्षेत्र में लाइफ़ जैकेट पहना कर समुद्र में उतार देना. ये ऐसी बात है जिसे लोग मानने को तैयार नहीं थे. "

याचिका पर सुनवाई के दौरान, दो जजों की बेंच में से एक ने इन आरोपों को "काल्पनिक विचार" बताया.

उन्होंने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने अपने दावों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दिए.

सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को दलीलें सुनने का फ़ैसला किया है ताकि यह तय हो सके कि रोहिंग्या को शरणार्थी माना जा सकता है या वे ग़ैरक़ानूनी प्रवासी हैं और इसलिए वापस भेजे जा सकते हैं.

भारत में दसियों हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं, ऐसे में यह साफ़ नहीं है कि केवल इन 40 लोगों को वापस भेजने में इतनी मेहनत क्यों की गई.

कोलिन ने कहा, ''भारत में कोई भी यह नहीं समझ पा रहा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. सिवाय एक वजह के. और वो ये कि मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जहर से ऐसा हो रहा है .''

शरणार्थियों के साथ हुए इस बर्ताव से भारत में पूरा रोहिंग्या समुदाय सहमा हुआ है.

इसके सदस्य दावा करते हैं कि पिछले एक साल में भारतीय अधिकारियों की ओर से उन्हें वापस भेजे जाने का आंकड़ा बढ़ गया है.

कुछ लोग छिप गए हैं. अमीन अब अपने घर पर नहीं सोते. उन्होंने अपनी बीवी और तीन बच्चों को कहीं और भेज दिया है.

वो कहते हैं, ''मेरे दिल में बस यही डर है कि भारत सरकार हमें भी कभी उठा कर समुद्र में फेंक देगी. अब हम अपने घरों से बाहर निकलने तक से डरते हैं.''

एंड्रयूज़ ने कहा, "ये लोग यहां इसलिए नहीं हैं कि ये भारत में रहना चाहते हैं. म्यांमार में जो ख़ौफ़नाक हिंसा हो रही है, उसकी वजह से वो यहां हैं. वो सचमुच अपनी जान बचाने के लिए भागे हैं."

( शार्लट स्कार की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ )

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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